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विश्व व्यवस्था की भौतिक स्थिति कमोबेश औपनिवेशिक युग जैसी ही बनी हुई है- कुछ सबसे अमीर औद्योगिक राष्ट्र ही बाकी दुनिया के सामाजिक व्यवहार का जबरन निर्धारण कर रहे हैं।