Author: अजीत प्रताप सिंह

कृष्ण अच्युत हो या न हो, पर होनी को कौन टाल सकता है। विदुर सहज हुए और राजसभा जाने की तैयारी करने लगे। पारंसवी पुनः बोली, “भूलना मत। उन्हें साथ ले आना खाने पर।”

Read More

सुमंत हाथ जोड़े खड़े थे। यह देख राम ने भी हाथ जोड़ लिए। राम प्रतीक्षा कर रहे थे कि सुमंत रथ पर चढ़कर विदा हो लें तो वे पैदल अपनी यात्रा जारी रखें।

Read More

हनुमान आश्चर्यचकित रह गए। प्रभु श्रीराम से बोले, “प्रभु, क्या यह सिंदूर लगाने से किसी को आपके निकट रहने का अधिकार प्राप्त हो जाता है?”

Read More

जब कृष्ण अपना विकट विराट रूप दिखाकर वापस लौट गए, और कुरुसभा ने अपने मस्तिष्क पर छाई धुन्ध को साफ किया, तो सब दुर्योधन को कोसने लगे जिसमें शकुनि और कर्ण भी सम्मिलित थे।

Read More

कृष्ण के तर्क ने हिडिम्बा को कुछ क्षणों के लिए हतप्रभ कर दिया। विचार करने पर उसे कृष्ण की बात ही सही लगी। पर जब मन में विरोध हो तो सामने वाले की किसी छोटी से छोटी, वार्ता में नितांत असंगत बात का आलम्बन लेकर विरोध करना क्षुद्र मानव प्रवृत्ति है।

Read More

युवा सन्यासी ने वीणा का तार छेड़ा और ‘नारायण-नारायण’ का स्वर निकालकर वृद्ध पुरुष का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

Read More